श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  11.27.19 
शुचि: सम्भृतसम्भार: प्राग्दर्भै: कल्पितासन: ।
आसीन: प्रागुदग् वार्चेदर्चायां त्वथ सम्मुख: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
अपने आप को साफ़ करने के पश्चात् तथा सभी सामग्री को एकत्र करने के पश्चात्, पूजा करने वाला अपने आसन को पूर्व की ओर की नोक वाले कुशा घास के द्वारा बनाए। तब वह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाए, लेकिन यदि अर्चाविग्रह एक स्थान पर स्थिर रखा गया है तो वह अर्चाविग्रह के सामने बैठ जाए।
 
After cleaning himself and collecting all the materials, the worshipper should make his seat with kusha grass facing east. Then he should sit facing east or north. Otherwise, if the idol is fixed at a place, then he should sit in front of the idol.
तात्पर्य
सम्भृता-सम्भार शब्द का अर्थ है, कि देवता की पूजा शुरू करने के पहले सभी आवश्यक सामग्रियों को पास ही रख लेना चाहिए। इस तरह से भिन्न-भिन्न चीज़ों की खोज के लिए बार-बार उठना नहीं पड़ेगा। यदि देवता स्थायी रूप से स्थापित किए गए हों, तो देवता के सामने बैठकर पूजा करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)