श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  11.27.14 
अस्थिरायां विकल्प: स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम् ।
स्‍नपनं त्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम् ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
अस्थायी रूप से स्थापित की गई मूर्ति का आवाहन और विसर्जन वैकल्पिक रूप से किया जा सकता है, लेकिन ये दोनों अनुष्ठान अवश्य करने चाहिए जब मूर्ति को भूमि पर अंकित किया गया हो। मूर्ति को जल से स्नान कराना चाहिए, लेकिन यदि वह मिट्टी, रंग या लकड़ी से बनी हो, तो जल के बिना ही उसकी अच्छी तरह से सफाई करनी चाहिए।
 
For the idol which is temporarily installed, Aahavana and Visarjan can be done as an alternative but both these rituals must be done after the idol has been imprinted on the ground. The idol should be bathed with water unless it is made of clay, pigment or wood. In that case, proper cleaning should be done without water.
तात्पर्य
विभिन्न श्रेणी के भक्त भगवान में अपनी आस्था के विभिन्न चरणों के अनुसार भगवान के व्यक्तित्व के देवता की पूजा करते हैं। भगवान कृष्ण के एक उन्नत भक्त भगवान के साथ अपने शाश्वत प्रेमपूर्ण संबंध को समझते हैं और देवता को भगवान के रूप में देखकर, उनके प्रति प्रेमपूर्ण सेवा के आधार पर देवता के साथ एक शाश्वत संबंध स्थापित करते हैं। भगवान कृष्ण को आनंद और ज्ञान का शाश्वत रूप समझकर, एक निष्ठावान भक्त देवता पूजा के लिए एक स्थायी व्यवस्था बनाता है, उदाहरण के लिए, पत्थर, लकड़ी या संगमरमर से बने भगवान के रूप को स्थापित करता है।

शालग्राम-शिला को औपचारिक समारोह के बिना भी स्वतः स्थापित माना जाता है, और इसलिए मंत्रों के साथ देवता को बुलाना या देवता को छोड़ने के लिए कहना मना है। दूसरी ओर, यदि कोई पवित्र भूमि पर चित्र बनाकर या रेत की मूर्ति बनाकर देवता का रूप तैयार करता है, तो उसे मंत्रों के साथ देवता को बुलाना चाहिए और फिर देवता को बाहरी रूप छोड़ने के लिए कहना चाहिए, जिसे जल्द ही प्राकृतिक तत्वों द्वारा ध्वस्त कर दिया जाएगा।

सामान्य सिद्धांत यह है कि भगवान का एक शुद्ध भक्त देवता के साथ अपने संबंध को शाश्वत समझता है। देवता के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति में जितना अधिक आत्मसमर्पण होता है, उतना ही अधिक व्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझ सकता है। भगवान कृष्ण एक व्यक्ति हैं, लेकिन वे सर्वोच्च व्यक्ति हैं, जिनकी अपनी अनूठी भावनाएँ हैं। कोई भी भगवान के देवता रूप को दी गई भक्ति सेवा से भगवान को आसानी से प्रसन्न कर सकता है। भगवान को प्रसन्न करके व्यक्ति मानव जीवन के मिशन में धीरे-धीरे प्रगति कर सकता है और अंततः घर वापस, भगवान के पास जा सकता है, जहाँ देवता व्यक्तिगत रूप से भक्त के सामने प्रकट होते हैं और भक्त का अपने व्यक्तिगत निवास में स्वागत करते हैं, जिसे दुनिया भर में भगवान के राज्य के रूप में जाना जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)