शालग्राम-शिला को औपचारिक समारोह के बिना भी स्वतः स्थापित माना जाता है, और इसलिए मंत्रों के साथ देवता को बुलाना या देवता को छोड़ने के लिए कहना मना है। दूसरी ओर, यदि कोई पवित्र भूमि पर चित्र बनाकर या रेत की मूर्ति बनाकर देवता का रूप तैयार करता है, तो उसे मंत्रों के साथ देवता को बुलाना चाहिए और फिर देवता को बाहरी रूप छोड़ने के लिए कहना चाहिए, जिसे जल्द ही प्राकृतिक तत्वों द्वारा ध्वस्त कर दिया जाएगा।
सामान्य सिद्धांत यह है कि भगवान का एक शुद्ध भक्त देवता के साथ अपने संबंध को शाश्वत समझता है। देवता के प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति में जितना अधिक आत्मसमर्पण होता है, उतना ही अधिक व्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझ सकता है। भगवान कृष्ण एक व्यक्ति हैं, लेकिन वे सर्वोच्च व्यक्ति हैं, जिनकी अपनी अनूठी भावनाएँ हैं। कोई भी भगवान के देवता रूप को दी गई भक्ति सेवा से भगवान को आसानी से प्रसन्न कर सकता है। भगवान को प्रसन्न करके व्यक्ति मानव जीवन के मिशन में धीरे-धीरे प्रगति कर सकता है और अंततः घर वापस, भगवान के पास जा सकता है, जहाँ देवता व्यक्तिगत रूप से भक्त के सामने प्रकट होते हैं और भक्त का अपने व्यक्तिगत निवास में स्वागत करते हैं, जिसे दुनिया भर में भगवान के राज्य के रूप में जाना जाता है।
