श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 27: देवपूजा विषयक श्रीकृष्ण के आदेश  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  11.27.13 
चलाचलेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम् ।
उद्वासावाहने न स्त: स्थिरायामुद्धवार्चने ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
सभी जीवों के रक्षक भगवान् का विग्रह दो प्रकार से स्थापित किया जा सकता है—अस्थायी या स्थायी। किंतु एक बार स्थायी विग्रह का आह्वान कर लेने पर, हे उद्धव, उसे कभी भी विसर्जित नहीं किया जा सकता।
 
The idol of the Lord who is the refuge of all living beings can be installed in two ways-temporarily or permanently. But O Uddhava, once the permanent idol has been invoked, it cannot be immersed.
तात्पर्य
प्रभु के भक्त स्वयं को भगवान के शाश्वत सेवक समझते हैं; देवता को स्वयं भगवान मानते हुए, वे स्थायी रूप से देवता की स्थापना करते हैं और निरंतर पूजा में संलग्न रहते हैं। दूसरी ओर, अवैयक्तिकवादी भगवान के शाश्वत रूप को भ्रम का एक अस्थायी प्रकटीकरण मानते हैं। वास्तव में, वे देवता रूप को भगवान बनने के अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम में केवल एक कदम का पत्थर मानते हैं। किसी भी तरह के भौतिकवादी व्यक्ति भगवान को अपने व्यवस्था आपूर्तिकर्ता मानते हैं, और इसलिए वे अस्थायी भौतिक संतुष्टि प्राप्त करने के लिए धार्मिक समारोहों के लिए अस्थायी व्यवस्था करते हैं। इस अस्थायी पूजा पद्धति को उन लोगों द्वारा पसंद किया जाता है जो अपने निजी उद्देश्यों के लिए भगवान के व्यक्तित्व का शोषण करना चाहते हैं, जबकि कृष्ण चेतना में प्रेमी भक्त शाश्वत रूप से भगवान के व्यक्तित्व की पूजा में संलग्न रहते हैं। वे स्थायी देवताओं की स्थापना करते हैं जिनकी पूजा सदा सर्वदा की जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)