श्रीउद्धव उवाच
क्रियायोगं समाचक्ष्व भवदाराधनं प्रभो ।
यस्मात्त्वां ये यथार्चन्ति सात्वता: सात्वतर्षभ ॥ १ ॥
अनुवाद
श्री उद्धव ने कहा: प्रभु जी, हे भक्तों के स्वामी, आप कृपा करके मुझे अपनी मूर्ति रूप में पूजा करने का विधान बताइये। मूर्ति की पूजा करने वाले भक्तों में कौन-कौन से गुण होते हैं? ऐसी पूजा किस आधार पर की जाती है? और पूजा करने की विशेष विधि क्या है?
Sri Uddhava said: O Lord, O Lord of devotees, kindly tell me the prescribed method of worshipping You in Your Archavigraha form. What are the abilities of devotees who worship the Archavigraha? On what basis is such worship established? And what is the specific method of worship?
तात्पर्य
प्रभु की निर्देशित ज़िम्मेदारियों को पूर्ण करने के अतिरिक्त, प्रभु के भक्तगण मंदिर में प्रभु के दिव्य स्वरूप की नियंत्रित पूजा करते हैं। ऐसी पूजा शक्तिशाली रूप से हृदय से अपने भौतिक शरीर के आनंद की वासना और इस वासना से सीधे निकलने वाले भौतिक परिवार के लगाव को साफ करती है। हालांकि, प्रभावी होने के लिए, दिव्य पूजा की प्रक्रिया अधिकृत तरीके से की जानी चाहिए। इसलिए उद्धव अब प्रभु से इस विषय के बारे में पूछताछ करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥