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bhagavat 11.26.7: राजा ऐल बोले : अरे! मेरी मोह-माया का जाल देखो! यह देवी मेरे गले लिपटती थी और मेरी गर्दन को अपनी मुट्ठी में जकड़े रहती थी। मेरा मन काम-वासना से इतना दूषित था कि मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि मेरा जीवन किस प्रकार व्यतीत हो रहा है।   |   bhagavat अध्याय 11.26: ऐल-गीत   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  11.26.7 
ऐल उवाच
अहो मे मोहविस्तार: कामकश्मलचेतस: ।
देव्या गृहीतकण्ठस्य नायु:खण्डा इमे स्मृता: ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
राजा ऐल बोले : अरे! मेरी मोह-माया का जाल देखो! यह देवी मेरे गले लिपटती थी और मेरी गर्दन को अपनी मुट्ठी में जकड़े रहती थी। मेरा मन काम-वासना से इतना दूषित था कि मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि मेरा जीवन किस प्रकार व्यतीत हो रहा है।
 
King Ail said: Alas! Look at the extent of my infatuation! This goddess used to embrace me and hold my neck in her fist. My heart was so tainted with lust that I did not even notice how my life was passing by.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)