सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्क: समुत्थित: ।
देवता बान्धवा: सन्त: सन्त आत्माहमेव च ॥ ३४ ॥
अनुवाद
मेरे भक्त दिव्य दृष्टि देते हैं, जबकि सूर्य केवल बाहरी दृष्टि देता है और वह भी तभी जब वह आकाश में हो। मेरे भक्त ही व्यक्ति के वास्तविक देवता और असली परिवार हैं; वे स्वयं व्यक्ति हैं, और अंततः वे मुझसे अलग नहीं हैं।
My devotees provide divine eyes, while the sun provides only external sight, and that too when it rises in the sky. My devotees are man's worshipful deities and real family; they are the soul itself and they are one with me.
तात्पर्य
मूर्खता ही अधर्मी का धन है, जो अपने खज़ाने को बहुत मूल्यवान समझते हैं और अज्ञानता के अंधकार में ही रहने का दृढ़तापूर्वक मन बना लेते हैं। भगवान के संत भक्त सूर्य के समान हैं। उनके शब्दों के प्रकाश से ही जीवों की ज्ञान की आँखें खुलती हैं और अज्ञानता का अंधकार नष्ट हो जाता है। इस प्रकार संत भक्त व्यक्ति के सच्चे मित्र और संबंधी होते हैं। वे ही सेवा के उचित पात्र हैं - न कि स्थूल भौतिक देह, जो केवल इंद्रियतृप्ति के लिए चिल्लाती रहती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥