अन्नं हि प्राणिनां प्राण आर्तानां शरणं त्वहम् ।
धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग् बिभ्यतोऽरणम् ॥ ३३ ॥
अनुवाद
जैसे समस्त प्राणियों के लिए भोजन ही जीवन है, जैसे मैं दुखियारों का परम आश्रय हूँ, और जैसे इस लोक से चल बसर होने वालों के लिए धर्म ही सम्पत्ति है, वैसे ही मेरे भक्त ही दुखदायी जीवन स्थिति में गिरने से डरने वालों के एकमात्र आश्रय हैं।
Just as food is life for all creatures, just as I am the ultimate refuge of the suffering and just as Dharma is wealth for those who die and leave this world, similarly my devotees are the only refuge of those who are afraid of falling into the sorrowful conditions of life.
तात्पर्य
जो लोग भौतिक कामनाओं और क्रोध के द्वारा नीचे की ओर खींच लिए जाने से भयभीत हैं, उन्हें भगवान के भक्तों के चरणकमलों की शरण लेनी चाहिए जो किसी को भी भगवान की प्रेममयी सेवा में सुरक्षित रूप से संलग्न कर सकते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥