श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  11.26.28 
तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथा: ।
सम्भवन्ति हि ता नृणां जुषतां प्रपुनन्त्यघम् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे भाग्यशाली उद्धव, ऐसे संत भक्तों के सत्संग में मेरा निरंतर गुणगान होता रहता है और जो लोग इस कीर्तन और मेरे यश के श्रवण में भाग लेते हैं, निश्चित रूप से सभी पापों से शुद्ध हो जाते हैं।
 
O highly fortunate Uddhava, in the company of such saintly devotees My discussion is always going on, and those who participate in this singing and hearing of My glories are certainly purified from all sins.
तात्पर्य
यदि कोई शुद्ध भक्त से सीधे उपदेश भी न प्राप्त करे, तो केवल उसके द्वारा श्रीभगवान के गुणगान सुन लेने से मायिक विषय-वासनाओं के कारण होनेवाले समस्त पाप-कर्मों से मुक्त हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)