गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।
गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुत: ।
वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणै: ॥ २ ॥
अनुवाद
प्रकृति के गुणों और उनके फलों से अपनी झूठी पहचान छोड़कर दिव्य ज्ञान में स्थिर व्यक्ति संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। वह इन फलों को मात्र भ्रम समझता है और इनके बीच रहकर भी इनसे नहीं उलझता। चूँकि प्रकृति के गुण और उनके फल वास्तविक नहीं होते, इसलिए वह उन्हें स्वीकार नहीं करता है।
A person established in transcendental knowledge is freed from conditioned life by giving up his false identification with the fruits of the modes of nature. He saves himself from being entangled in the modes of nature by considering these fruits to be mere illusions and living constantly amidst them. Since the qualities and their fruits are not true, he does not accept them.
तात्पर्य
प्रकृति के ये तीनों गुण - विविध प्रकार के भौतिक शरीरों, स्थानों, परिवारों, देशों, खाद्य पदार्थों, खेलों, युद्धों, शांति के रूप में प्रकट होते हैं और इसी तरह। दूसरे शब्दों में, भौतिक दुनिया के भीतर हम जो कुछ भी देखते हैं वह प्रकृति के गुणों से बना है। एक मुक्त आत्मा, भौतिक ऊर्जा के सागर में विद्यमान होने पर भी, सब कुछ भगवान की संपत्ति के रूप में देखता है और इस तरह उलझता नहीं है। यद्यपि माया ऐसी मुक्त आत्मा को चोर बनने के लिए प्रलोभित करती है - इंद्रिय तृप्ति के लिए भगवान की संपत्ति चुराने के लिए - एक कृष्ण चेतन व्यक्ति माया के चारा को नहीं खाता है; वह कृष्ण चेतना में ईमानदार और पवित्र रहता है। दूसरे शब्दों में, वह यह नहीं मानता कि ब्रह्मांड में कुछ भी इंद्रिय तृप्ति के लिए उसकी निजी संपत्ति बन सकता है, विशेष रूप से एक महिला का भ्रामक रूप।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥