श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  11.26.19-20 
पित्रो: किं स्वं नु भार्याया: स्वामिनोऽग्ने: श्वगृध्रयो: ।
किमात्मन: किं सुहृदामिति यो नावसीयते ॥ १९ ॥
तस्मिन् कलेवरेऽमेध्ये तुच्छनिष्ठे विषज्जते ।
अहो सुभद्रं सुनसं सुस्मितं च मुखं स्‍त्रिय: ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
शरीर वास्तव में किसकी संपत्ति है, यह कोई कभी निश्चित नहीं कर सकता। क्या यह उन माता-पिता की है जिसने उसे जन्म दिया है, या इसे सुख देने वाली पत्नी की है, या इसके मालिक की है, जो शरीर को हुक्म देता रहता है? या यह चिता की अग्नि की या उन कुत्तों और सियारों की है, जो अंततः इसका भक्षण करेंगे? क्या यह उस आत्मा की संपत्ति है, जो इसके सुख-दुख में साथ देती है या यह शरीर उन घनिष्ठ मित्रों का है जो इसे प्रोत्साहित करते हैं और इसकी सहायता करते हैं? यद्यपि मनुष्य कभी भी शरीर के स्वामी को निश्चित नहीं कर पाता, फिर भी वह इससे अनुरक्त रहता है। यह भौतिक शरीर उस दूषित पदार्थ के समान है जो निम्न स्थान की ओर बढ़ रहा है, फिर भी जब मनुष्य किसी स्त्री के मुख की ओर टकटकी लगाता है, तो सोचता है, "कितनी सुंदर है यह स्त्री? कैसी सुघड़ नाक है इसकी और जरा इसकी सुंदर हँसी को तो देखो।"
 
One cannot determine whose property the body really is. Does it belong to the parents who have given birth to it, or to the wife who has comforted it, or to its master who commands the body? Or does it belong to the fire of the funeral pyre, or to the dogs and jackals who will ultimately devour it? Is it the property of the inner soul who accompanies it in its joys and sorrows, or does the body belong to the intimate friends who encourage and help it? Although one can never determine the owner of the body, he remains attached to it. This material body is like a polluted matter moving towards a lower place; yet when one gazes at a woman's face, one thinks, "How beautiful she is! What a graceful nose she has, and just look at her beautiful smile."
तात्पर्य
तुच्छ-निष्ठे पदावली यह दर्शाता है "नीच गंतव्य की ओर अग्रसर", यह दर्शाता है कि यदि गाड़ लिया जाए तो शरीर कीड़े खा जाएँगे; यदि जला दिया जाता है तो वह राख हो जाएगा; और यदि किसी सुनसान जगह पर मरता है, तो उसे कुत्ते और गिद्ध खा जाएँगे। माया की भ्रामक शक्ति स्त्री रूप के अंदर प्रवेश करती है और एक आदमी के दिमाग को भ्रमित करती है। पुरुष स्त्री रूप के अंदर प्रकट होने वाली माया की ओर आकर्षित होता है, लेकिन जब वह महिला के शरीर को गले लगाता है तो वह दो मुट्ठी मल, रक्त, बलगम, मवाद, त्वचा, हड्डी, बाल और मांस के साथ समाप्त होता है। लोगों को बिल्लियों और कुत्तों की तरह शारीरिक चेतना की अज्ञानता में नहीं होना चाहिए। एक इंसान को कृष्ण चेतना में प्रबुद्ध होना चाहिए और झूठे तौर पर उनकी शक्ति का फायदा उठाने की कोशिश किए बिना सर्वोच्च भगवान की सेवा करना सीखना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)