श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  11.26.17 
किमेतया नोऽपकृतं रज्ज्वा वा सर्पचेतस: ।
द्रष्टु: स्वरूपाविदुषो योऽहं यदजितेन्द्रिय: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
मैं अपने दुःख के लिए उसे कैसे दोषी ठहरा सकता हूँ जब मैं खुद अपने वास्तविक आध्यात्मिक स्वभाव को नहीं जानता हूँ? मैंने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रखा और यही कारण है कि मैं उस व्यक्ति की तरह हूँ जो भूलवश एक हानिरहित रस्सी को साँप समझ लेता है।
 
How can I blame him for my suffering when I myself am unaware of my true spiritual nature? I have not been able to control my senses, so I am like a person who mistakes a harmless rope for a snake.
तात्पर्य
जो व्यक्ति रस्सी को साँप समझ बैठता है, वह भयभीत और चिंतित हो जाता है। ऐसा डर और चिंता निश्चित रूप से भ्रम है, क्योंकि रस्सी कभी नहीं काट सकती। उसी प्रकार, जो भ्रमवश यह सोचता है कि प्रभु की भौतिक, मायावी ऊर्जा उनकी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए विद्यमान है, वह निश्चित रूप से अपने सिर पर भौतिक, भ्रामक भय और चिंता के पहाड़ टूटते हुए लाएगा। राजा पुरूरवा यहाँ खुलकर स्वीकार करते हैं कि युवती उर्वशी को दोष नहीं दिया जाना चाहिए। आख़िरकार, पुरूरवा ही वह थे जिन्होंने भूलवश उन्हें अपने व्यक्तिगत आनंद का साधन समझा था, और इसलिए उन्हें प्रकृति के नियमों के अनुसार प्रतिक्रिया मिली। पुरूरवा स्वयं ही उर्वशी के बाहरी रूप का फायदा उठाने की कोशिश करने वाले अपराधी थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)