श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  11.26.16 
बोधितस्यापि देव्या मे सूक्तवाक्येन दुर्मते: ।
मनोगतो महामोहो नापयात्यजितात्मन: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि मैंने अपनी बुद्धि को मंद होने दिया और क्योंकि मैं अपनी इंद्रियों को नियंत्रित नहीं कर सका, इसीलिए मेरे मन का महान मोह दूर नहीं हुआ, यद्यपि उर्वशी ने सुन्दर वचनों द्वारा मुझे अच्छी सलाह दी थी।
 
Because I allowed my intellect to become dull and because I could not control my senses, the great attachment in my mind did not go away even though Urvashi gave me good advice with beautiful words.
तात्पर्य
जैसा कि श्रीमद-भागवतम के नौवें कांटो में वर्णित है, देवी उर्वशी ने पुरूरवा से साफ तौर पर कहा कि उसे कभी भी स्त्रियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए या उनके वचनों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। इस स्पष्ट सलाह के बावजूद, वह पूरी तरह से आसक्त हो गए और इस तरह उन्हें बहुत मानसिक पीड़ा हुई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)