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bhagavat 11.26.15: भगवान् के अतिरिक्त मेरी इस चेतना को जो वेश्या के द्वारा चुराई जा चुकी है, भला और कौन बचा सकता है? भगवान् तो भौतिक अनुभूति के परे हैं और आत्मनिर्भर मुनियों के स्वामी भी हैं।   |   bhagavat अध्याय 11.26: ऐल-गीत   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  11.26.15 
पुंश्चल्यापहृतं चित्तं को न्वन्यो मोचितुं प्रभु: ।
आत्मारामेश्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान् के अतिरिक्त मेरी इस चेतना को जो वेश्या के द्वारा चुराई जा चुकी है, भला और कौन बचा सकता है? भगवान् तो भौतिक अनुभूति के परे हैं और आत्मनिर्भर मुनियों के स्वामी भी हैं।
 
Who but the Supreme Lord, who is beyond material perception and the Lord of the sages, can save my consciousness which has been stolen by a prostitute?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)