सेवतो वर्षपूगान् मे उर्वश्या अधरासवम् ।
न तृप्यत्यात्मभू: कामो वह्निराहुतिभिर्यथा ॥ १४ ॥
अनुवाद
यद्यपि मै उर्वशी के होठों के अमृत समान माधुर्य का सेवन वर्षों तक कर चुका था किन्तु मेरा काम-वासनाओं का समुद्र बारम्बार हिलोरें लेता रहा और कभी शांत नहीं हुआ, ठीक वैसे ही जैसे घी की आहुति डालने पर, अग्नि कभी बुझती नहीं।
Although I had enjoyed the so-called nectar of Urvashi's lips for many years, my sexual desires continued to rise again and again in my heart and were never satisfied, just as a fire can never be extinguished by offering ghee.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥