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bhagavat 11.25.27: आध्यात्मिक जीवन के लक्ष्य के लिए केंद्रित श्रद्धा सात्विक है, सार्थक कार्य से प्रेरित श्रद्धा राजसिक है और अधार्मिक कार्यों में निवास करने वाली श्रद्धा तामसिक है परन्तु मेरी भक्ति में की जाने वाली श्रद्धा पूर्ण रूप से दिव्य है।   |   bhagavat अध्याय 11.25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  11.25.27 
सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी ।
तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
आध्यात्मिक जीवन के लक्ष्य के लिए केंद्रित श्रद्धा सात्विक है, सार्थक कार्य से प्रेरित श्रद्धा राजसिक है और अधार्मिक कार्यों में निवास करने वाली श्रद्धा तामसिक है परन्तु मेरी भक्ति में की जाने वाली श्रद्धा पूर्ण रूप से दिव्य है।
 
Faith directed towards spiritual life is Satvik; faith based on selfish action is Rajasic and faith residing in irreligious acts is Tamasi but the faith shown in devotion to Me is purely divine.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)