श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  11.25.20 
सत्त्वाज्जागरणं विद्याद् रजसा स्वप्नमादिशेत् ।
प्रस्वापं तमसा जन्तोस्तुरीयं त्रिषु सन्ततम् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
यह समझना चाहिए कि जागरूकता की सक्रियता सतोगुण से आती है, सपनों वाली नींद रजोगुण से आती है और गहरी, स्वप्नहीन नींद तमोगुण से आती है। चेतना की चौथी अवस्था इन तीनों में व्याप्त रहती है और दिव्य होती है।
 
One should know that wakefulness comes from the Satva Guna, sleep comes from Rajoguna dreaming and deep dreamless sleep comes from Tamoguna. The fourth state of consciousness pervades these three and is divine.
तात्पर्य
हमारी मूल कृष्ण चेतना हमारी आत्मा के अन्दर अनन्त काल से विद्यमान है, और यह जागृति की तीनों अवस्थाओं में भी विद्यमान है, अर्थात् सामान्य जागृति, स्वप्न और निद्रा। प्रकृति के तीनो गुणों के कारण यह आध्यात्मिक चेतना प्रकट नहीं हो पाती है, लेकिन यह जीवित प्राणी के वास्तविक स्वरूप के रूप में हमेशा बनी रहती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)