श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 24: सांख्य दर्शन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  11.24.15 
मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् ।
गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
इस जगत में सकाम कर्म के फल मेरे द्वारा, परम स्रष्टा द्वारा, काल की शक्ति के रूप में कार्य करते हुए निर्धारित किए गए हैं। इस तरह, मनुष्य प्रकृति के गुणों की प्रबल धारा में कभी ऊपर उठता है और कभी डूब जाता है।
 
इस जगत में सकाम कर्म के फल मेरे द्वारा, परम स्रष्टा द्वारा, काल की शक्ति के रूप में कार्य करते हुए निर्धारित किए गए हैं। इस तरह, मनुष्य प्रकृति के गुणों की प्रबल धारा में कभी ऊपर उठता है और कभी डूब जाता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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