श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  11.23.61 
य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहित: ।
धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन्द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते ॥ ६१ ॥
 
 
अनुवाद
जो कोई भी संन्यासी के ज्ञानपूर्ण गीत को सुनता है, उसे दूसरों तक पहुंचाता है और उसे पूरे ध्यान के साथ मनन करता है, वह फिर कभी भौतिक सुख और दुःख के दोहरेपन से कभी अभिभूत नहीं होगा।
 
Whoever listens to or recites this song of the Sanyasi, which presents the scientific knowledge of Brahman, and whoever meditates upon it with full concentration, will never again be overwhelmed by the duality of material happiness and misery.
तात्पर्य
वैष्णव संन्यासी ने भगवान की भक्ति सेवा की शरण ली और इस तरह अपने पूजनीय वस्तु, भगवान श्री के मायावी सामर्थ्य से ऊपर उठ गए। उन्होंने स्वंय इस गीत पर ध्यान किया और सुना, और दूसरों को भी सिखाया। भगवान की दया प्राप्त करके, उन्होंने अन्य बंधी हुई आत्माओं को आध्यात्मिक बुद्धि से प्रबुद्ध किया ताकि वे भी भगवान के भक्तों के पदचिन्हों पर चल सकें। धर्म का वास्तव में अर्थ है प्रेममय सेवा में भगवान के शुद्ध भक्त बनना। जो लोग भौतिक दुनिया का आनंद लेने की कोशिश कर रहे हैं या केवल व्यक्तिगत असुविधा से बचने के लिए इसका त्याग करते हैं, वे वास्तव में भगवान के प्रति प्रेम को समझ नहीं सकते, जिसमें एकमात्र उद्देश्य भगवान की संतुष्टि है।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत तेईसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)