श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  11.23.57 
एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठा-
मध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभि: ।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं
तमो मुकुन्दाङ्‍‍घ्रिनिषेवयैव ॥ ५७ ॥
 
 
अनुवाद
मैं कृष्ण के चरणकमलों की सेवा में दृढ़ होकर अज्ञानता के विशाल और दुर्गम सागर को पार कर जाऊँगा। इस बात की पुष्टि पिछले आचार्यों ने की है, जो परमात्मा की भक्ति में निष्ठावान थे।
 
I shall cross the impassable ocean of ignorance by remaining steadfast in the service of the lotus feet of Krishna. This has been confirmed by the previous acharyas who were steadfast in devotion to the Supreme Being.
तात्पर्य
इस श्लोक को कृष्णदास कविराज ने अपनी चैतन्य-चरितामृत (मध्य-लीला 3.6) में उद्धृत किया है। श्रीला प्रभुपाद इस प्रकार टिप्पणी करते हैं। "इस श्लोक के संबंध में, जो श्रीमद-भागवतम (11.23.57) से एक उद्धरण है, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि भक्ति सेवा प्रदान करने के लिए आवश्यक चौसठ वस्तुओं में से संन्यास के प्रतीकात्मक चिह्नों की स्वीकृति एक नियमित सिद्धांत है। यदि कोई संन्यास आदेश स्वीकार करता है, तो उसका मुख्य व्यवसाय अपने जीवन को पूरी तरह से मुकुंद, कृष्ण की सेवा में समर्पित करना है। यदि कोई अपने मन और शरीर को ईश्वर की सेवा में पूरी तरह से समर्पित नहीं करता है, तो वह वास्तव में एक संन्यासी नहीं बनता है। यह केवल कपड़े बदलने की बात नहीं है। भगवद-गीता (6.1) में भी कहा गया है, अनाश्रितः कर्म-फलं कार्यं कर्म करोति यः/ स संन्यासी च योगी च: जो कृष्ण की संतुष्टि के लिए श्रद्धापूर्वक कार्य करता है वह एक संन्यासी है। कपड़े संन्यास नहीं हैं, लेकिन कृष्ण की सेवा करने का दृष्टिकोण है। " "परमात्मा-निष्ठा शब्द का अर्थ भगवान कृष्ण का भक्त होना है। परमात्मा, सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण है। ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानंद-विग्रहः। जो लोग कृष्ण के चरण कमलों को सेवा में पूरी तरह से समर्पित हैं वे वास्तव में संन्यासी हैं। औपचारिकता के तौर पर, भक्त संन्यास की पोशाक स्वीकार करता है जैसा कि पिछले आचार्यों ने किया था। वह तीन दंड भी स्वीकार करता है। बाद में विष्णुस्वामी ने माना कि त्रिदंडी के वेश को स्वीकार करना परमात्मा-निष्ठा थी। इसलिए निष्ठावान भक्त मौजूदा तीन दंडों में एक और दंड, जीव-दंड जोड़ते हैं। वैष्णव संन्यासी को त्रिदंडी-संन्यासी के रूप में जाना जाता है। मायावादी संन्यासी केवल एक ही दंड स्वीकार करता है, त्रिदंड के उद्देश्य को नहीं समझता है। बाद में, शिव स्वामी के समुदाय के कई व्यक्तियों ने प्रभु की आत्मा-निष्ठा (भक्ति सेवा) को त्याग दिया और शंकराचार्य के मार्ग का अनुसरण किया। 108 नामों को स्वीकार करने के बजाय, शिव स्वामी संप्रदाय में वे शंकराचार्य के मार्ग का अनुसरण करते हैं और संन्यास के दस नाम स्वीकार करते हैं। यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु ने तत्कालीन संन्यास के आदेश को स्वीकार कर लिया (अर्थात् एकादंड), फिर भी उन्होंने एकवंतिपुरा के ब्राह्मण द्वारा स्वीकार किए गए त्रिदंड-संन्यास के बारे में श्रीमद् भागवतम से एक श्लोक सुनाया। परोक्ष रूप से उन्होंने घोषणा की कि एकादंड (एक दंड) के भीतर, चार दंड एक के रूप में विद्यमान थे। परमात्मा-निष्ठा (भगवान कृष्ण की भक्ति सेवा) के बिना एकादंड संन्यास को स्वीकार करना श्री चैतन्य महाप्रभु को स्वीकार्य नहीं है। इसके अलावा, सटीक नियामक सिद्धांतों के अनुसार, किसी को त्रिदंड में जीव-दंड जोड़ना चाहिए। ये चार दंड, एक साथ बंधे हुए, प्रभु की निष्ठावान भक्ति सेवा के प्रतीक हैं। क्योंकि मायावादी स्कूल के एकादंडी-संन्यासी कृष्ण की सेवा के लिए समर्पित नहीं हैं, वे ब्रह्म तेज में विलीन होने की कोशिश करते हैं, जो कि भौतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व के बीच एक मामूली स्थिति है। वे इस अवैयक्तिक स्थिति को मुक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं। मायावादी संन्यासियों को यह पता नहीं है कि श्री चैतन्य महाप्रभु एक त्रिदंडी थे, चैतन्य महाप्रभु को एकादंडी-संन्यासी समझते हैं। यह उनके विवर्त, घबराहट के कारण है। श्रीमद-भागवतम में एकादंडी-संन्यासी जैसी कोई चीज नहीं है; वास्तव में, त्रिदंडी-संन्यासी को संन्यास आदेश के प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व के रूप में स्वीकार किया जाता है। श्रीमद-भागवतम से इस श्लोक का हवाला देकर, श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीमद-भागवतम में अनुशंसित संन्यास आदेश को स्वीकार कर लिया। मायावादी संन्यासी, जो प्रभु की बाहरी ऊर्जा के कायल हैं, श्री चैतन्य महाप्रभु के मन को समझ नहीं सकते।

अभी तक श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी भक्त उनके पद-चिन्हों पर चलते हुए, संन्यास आश्रम को स्वीकार करते हैं और पवित्र यज्ञोपवीत तथा जटा रखते हैं। मायावादी संप्रदाय के एकदंडी-संन्यासी इस यज्ञोपवीत का त्याग कर देते हैं और न ही जटा रखते हैं। इसलिए वे त्रिदंडी-संन्यास के मर्म को समझने में असमर्थ हैं, और इस कारण वे मुकुंद के सेवा में अपनी जिंदगी को समर्पित करने की ओर प्रवृत्त नहीं होते। भौतिक अस्तित्व से घृणा के कारण वे केवल अस्तित्व के ब्रह्म में विलीन होने के बारे में ही सोचते हैं। दैवोपनीषद-वर्णाश्रम (भगवत-गीता में वर्णित चतुर्वर्ण्यम की सामाजिक व्यवस्था) की वकालत करने वाले आचार्य, आसुर-वर्णाश्रम के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते, जो कहता है कि वर्ण की सामाजिक व्यवस्था जन्म द्वारा निश्चित है। श्री चैतन्य महाप्रभु के सबसे अंतरंग भक्त, अर्थात् गदाधर पंडित ने त्रिदंडी-संन्यास स्वीकार किया और माधव उपाध्याय को अपने त्रिदंडी-संन्यासी शिष्य के रूप में स्वीकार किया। कहा जाता है कि इसी माधवाचार्य से पश्चिमी भारत में वल्लभाचार्य संप्रदाय के नाम से जाना जाने वाला संप्रदाय शुरू हुआ। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में स्मृति-आचार्य के रूप में विख्यात श्रील गोपाल भट्ट वसु ने बाद में त्रिदंडीपाठ प्रबोधानंद सरस्वती से त्रिदंडी-संन्यास क्रम को स्वीकार किया। यद्यपि त्रिदंडी-संन्यास को स्वीकार करने का स्पष्ट उल्लेख गौड़ीय वैष्णव साहित्य में नहीं मिलता, परंतु श्रील रूप गोस्वामी के उपदेशामृत के पहले श्लोक में वकालत की गई है कि छह शक्तियों पर नियंत्रण कर व्यक्ति को त्रिदंडी-संन्यास क्रम को स्वीकार करना चाहिए। वाचो वेगं मनसः क्रोध-वेगं जिह्वा-वेगं उद्रोपस्थ-वेगं एतान वेगान यो विषहे धीरः सर्व्वान आपीमां पृथ्वीं स शिष्यात 'जो वाणी, मन, क्रोध, उदर, जिव्हा और गुप्तांगों की शक्तियों को नियंत्रित कर सकता है उसे गोस्वामी के रूप में जाना जाता है और वह सारे संसार में शिष्यों को स्वीकार करने के लिए दक्ष होता है।' श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों ने मायावादी क्रम के संन्यास को कभी स्वीकार नहीं किया, और इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीधर स्वामी को स्वीकार किया, जो एक त्रिदंडी-संन्यासी थे, किंतु मायावादी संन्यासी श्रीधर स्वामी को समझ नहीं पाते हैं, कभी-कभी सोचते हैं कि श्रीधर स्वामी मायावादी एकदंडी-संन्यास समुदाय से थे। वास्तव में यह सत्य नहीं था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)