अभी तक श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी भक्त उनके पद-चिन्हों पर चलते हुए, संन्यास आश्रम को स्वीकार करते हैं और पवित्र यज्ञोपवीत तथा जटा रखते हैं। मायावादी संप्रदाय के एकदंडी-संन्यासी इस यज्ञोपवीत का त्याग कर देते हैं और न ही जटा रखते हैं। इसलिए वे त्रिदंडी-संन्यास के मर्म को समझने में असमर्थ हैं, और इस कारण वे मुकुंद के सेवा में अपनी जिंदगी को समर्पित करने की ओर प्रवृत्त नहीं होते। भौतिक अस्तित्व से घृणा के कारण वे केवल अस्तित्व के ब्रह्म में विलीन होने के बारे में ही सोचते हैं। दैवोपनीषद-वर्णाश्रम (भगवत-गीता में वर्णित चतुर्वर्ण्यम की सामाजिक व्यवस्था) की वकालत करने वाले आचार्य, आसुर-वर्णाश्रम के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते, जो कहता है कि वर्ण की सामाजिक व्यवस्था जन्म द्वारा निश्चित है। श्री चैतन्य महाप्रभु के सबसे अंतरंग भक्त, अर्थात् गदाधर पंडित ने त्रिदंडी-संन्यास स्वीकार किया और माधव उपाध्याय को अपने त्रिदंडी-संन्यासी शिष्य के रूप में स्वीकार किया। कहा जाता है कि इसी माधवाचार्य से पश्चिमी भारत में वल्लभाचार्य संप्रदाय के नाम से जाना जाने वाला संप्रदाय शुरू हुआ। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में स्मृति-आचार्य के रूप में विख्यात श्रील गोपाल भट्ट वसु ने बाद में त्रिदंडीपाठ प्रबोधानंद सरस्वती से त्रिदंडी-संन्यास क्रम को स्वीकार किया। यद्यपि त्रिदंडी-संन्यास को स्वीकार करने का स्पष्ट उल्लेख गौड़ीय वैष्णव साहित्य में नहीं मिलता, परंतु श्रील रूप गोस्वामी के उपदेशामृत के पहले श्लोक में वकालत की गई है कि छह शक्तियों पर नियंत्रण कर व्यक्ति को त्रिदंडी-संन्यास क्रम को स्वीकार करना चाहिए। वाचो वेगं मनसः क्रोध-वेगं जिह्वा-वेगं उद्रोपस्थ-वेगं एतान वेगान यो विषहे धीरः सर्व्वान आपीमां पृथ्वीं स शिष्यात 'जो वाणी, मन, क्रोध, उदर, जिव्हा और गुप्तांगों की शक्तियों को नियंत्रित कर सकता है उसे गोस्वामी के रूप में जाना जाता है और वह सारे संसार में शिष्यों को स्वीकार करने के लिए दक्ष होता है।' श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों ने मायावादी क्रम के संन्यास को कभी स्वीकार नहीं किया, और इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीधर स्वामी को स्वीकार किया, जो एक त्रिदंडी-संन्यासी थे, किंतु मायावादी संन्यासी श्रीधर स्वामी को समझ नहीं पाते हैं, कभी-कभी सोचते हैं कि श्रीधर स्वामी मायावादी एकदंडी-संन्यास समुदाय से थे। वास्तव में यह सत्य नहीं था।
