श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  11.23.56 
न केनचित् क्व‍ापि कथञ्चनास्य
द्वन्द्वोपराग: परत: परस्य ।
यथाहम: संसृतिरूपिण: स्या-
देवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतै: ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
मिथ्या अहंकार मायामयी भौतिक जगत का निर्माण करता है। इस तरह उसे भौतिक सुखों और कष्टों का अनुभव होता है। लेकिन आत्मा भौतिक प्रकृति से परे है। वह किसी भी स्थान, किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति के कार्य से भौतिक सुख और दुखों से कभी प्रभावित नहीं होता। जो व्यक्ति इसे समझ लेता है, उसे भौतिक सृष्टि से किसी भी बात का भय नहीं होता।
 
The false ego gives form to the illusory world and thus experiences material pleasure and pain. But the Self is beyond material nature. It is not affected by material pleasure and pain in any place, in any condition or through any person. A person who understands this has nothing to fear from the material world.
तात्पर्य
ब्राह्मण ने छः विशिष्ट स्पष्टीकरणों का खंडन किया है जो जीवों की खुशी और दुख के लिए दिए गए थे और अब वह किसी अन्य स्पष्टीकरण का खंडन करता है जो कि दिया जा सकता है | झूठे अभिमान के साथ, शारीरिक ढकाव आध्यात्मिक आत्मा को ढक लेता है और इसलिए व्यक्ति गलत तरीके से उसे प्राप्त करता है और उसे भोगता है जिसका वास्तव में अपने आप से कोई संबंध नहीं है | वह जो ब्राह्मण के इस उदात्त शिक्षण को समझ सकता है, जो कि उद्धव के समक्ष भगवान द्वारा कहा गया था, वह व्यक्ति फिर कभी भौतिक दुनिया में भय की भयानक चिंता से पीड़ित नहीं होगा |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)