श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  11.23.55 
कालस्तुहेतु: सुखदु:खयोश्चेत्
किमात्मनस्तत्रतदात्मकोऽसौ ।
नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात्
क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम् ॥ ५५ ॥
 
 
अनुवाद
यदि हम मान भी लें कि सुख और दुखों का कारण काल है तो भी यह अनुभव आत्मा पर लागू नहीं हो सकता क्योंकि काल भगवान की आध्यात्मिक शक्ति की अभिव्यक्ति है और जीव भी उसी शक्ति के अंश हैं, जो काल के माध्यम से प्रकट होती है। निश्चित रूप से, आग अपनी ही लपटों या चिंगारियों को नहीं जलाती और न ही ठंड अपने ही रूप ओलों को नुकसान पहुंचाती है। वास्तव में, आत्मा दिव्य है और भौतिक सुख-दुखों के अनुभव से परे है। तो फिर किसी के ऊपर क्रोधित क्यों हों?
 
Even if we accept time as the cause of pleasure and pain, this experience cannot apply to the soul because time is the manifestation of the spiritual power of the Lord and the living entities are also part of that power which manifests through time. It is certain that fire does not burn its own flame or sparks, nor does cold harm its own form hail. In fact, the soul is divine and beyond the experience of physical pleasure and pain. So on whom should one show anger?
तात्पर्य
भौतिक शरीर जड़ पदार्थ है और वह सुख-दुख या किसी अन्य चीज़ का अनुभव नहीं करता। क्योंकि आत्मा पूर्ण रूप से भौतिकता से परे है, उसे अपनी चेतना को भौतिक सुख-दुख से परे स्थित भगवान पर केंद्रित करना चाहिए। केवल जब पारलौकिक चेतना भ्रमवश जड़ पदार्थ के साथ तादात्म्य करती है, तभी जीव कल्पना करता है कि वह भौतिक जगत में सुख और दुख का अनुभव कर रहा है। चेतना का पदार्थ के साथ यह भ्रामक तादात्म्य मिथ्या अहंकार कहलाता है और भौतिक अस्तित्व का कारण है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)