श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  11.23.54 
कर्मास्तुहेतु: सुखदु:खयोश्चेत्
किमात्मनस्तद्धिजडाजडत्वे ।
देहस्त्वचित् पुरुषोऽयं सुपर्ण:
क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम् ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
यदि हम मान लें कि सकाम कर्म सुख और दुख का कारण है, तो भी हम आत्मा की बात नहीं करते। भौतिक कर्म का भाव तभी उत्पन्न होता है जब कोई चेतन कर्ता और एक भौतिक शरीर होता है जो ऐसे कर्म के फलस्वरूप सुख और दुख का अनुभव करता है। चूंकि शरीर में जीवन नहीं होता, इसलिए यह सुख-दुख का वास्तविक प्राप्तकर्ता नहीं हो सकता और न ही आत्मा, जो अंततः पूरी तरह से आध्यात्मिक है और शरीर से अलग रहती है। चूंकि कर्म का ना तो शरीर पर और ना ही आत्मा पर कोई परम आधार है, तो फिर कोई किस पर क्रोध कर सकता है?
 
If we admit that fruitive action is the cause of happiness and misery, we are still not talking of the soul. Material action arises when there is a conscious agent and a material body, which receives the disorders of happiness and misery as the result of such action. Since the body has no life, it can be neither the real recipient of happiness and misery, nor the soul, which is ultimately entirely spiritual and separate from the body. Since action has no ultimate basis either in the body or in the soul, whom should one be angry at?
तात्पर्य
भौतिक शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु से मिलकर बना है, बिलकुल ईंटों, पत्थरों और अन्य वस्तुओं की तरह। हमारी चेतना, जो शरीर में गलती से ही लीन हो गई है, सुख और दुख का अनुभव करती है, और कर्म का कार्य (कर्म) तब किया जाता है जब हम गलत तरीके से खुद को भौतिक दुनिया का भोगी मानते हैं। इस प्रकार मिथ्या अहंकार हमारे मन के भीतर आत्म और शरीर का भ्रामक संयोजन है, जो वास्तव में दो अलग-अलग वस्तुएँ हैं। चूँकि कर्म, या भौतिक कार्य, भ्रामक चेतना पर आधारित है, इसलिए ये क्रियाएँ भी भ्रामक हैं और शरीर या आत्मा में इनका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है। जब एक सशर्त आत्मा गलत तरीके से खुद को शरीर मानती है, और इसलिए भौतिक दुनिया का आनंद लेने वाला, वह स्त्रियों के साथ अवैध संबंध में सुख खोजने का प्रयास करती है। ऐसी पापी गतिविधि शरीर होने और इस तरह स्त्रियों और दुनिया का भोगी होने की उसकी झूठी अवधारणा पर आधारित है। चूँकि वह शरीर नहीं है, इसलिए एक स्त्री का आनंद लेने की उसकी गतिविधि वास्तव में मौजूद नहीं है। केवल दो मशीनों, अर्थात् दो शरीरों की बातचीत होती है, और पुरुष और महिला की भ्रामक चेतना की बातचीत होती है। अवैध यौन संबंध की अनुभूति भौतिक शरीर के भीतर होती है और झूठे अहंकार द्वारा गलत तरीके से अपने स्वयं के अनुभव के रूप में आत्मसात कर ली जाती है। इस प्रकार कर्म की दयनीय या सुखद प्रतिक्रियाएँ अंततः झूठे अहंकार पर ही कार्य करती हैं न कि शरीर पर, जो नीरस पदार्थ से बना है, और न ही आत्मा पर, जिसका पदार्थ से कोई लेना-देना नहीं है। मिथ्या अहंकार मन का भ्रामक मनगढ़ंत है; यह विशेष रूप से यह मिथ्या अहंकार है जो सुख और दुख का अनुभव कर रहा है। आत्मा दूसरों पर क्रोधित नहीं हो सकती, क्योंकि वह व्यक्तिगत रूप से आनंद या दुख नहीं पा रही है। बल्कि, झूठा अहंकार ऐसा कर रहा है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)