आध्यात्मिक स्तर पर न तो भौतिक सुख है और न ही संकट क्योंकि वहाँ जीवित चेतना पूरी तरह से लिप्त है, व्यक्तिगत इच्छा के बिना, परम प्रभु की भक्ति सेवा में। यह सुख की वास्तविक स्थिति है, जो झूठी शारीरिक पहचान से अलग है। दूसरों के साथ अपनी मूर्खता के लिए व्यर्थ में क्रोधित होने के बजाय, व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार करना चाहिए और जीवन की समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
