श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  11.23.52 
आत्मा यदि स्यात् सुखदु:खहेतु:
किमन्यतस्तत्र निजस्वभाव: ।
न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात्
क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दु:खम् ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
यदि आत्मा स्वयं सुख और दुख का कारण होता, तो हम दूसरों को दोष नहीं दे सकते थे, क्योंकि तब सुख और दुख केवल आत्मा के स्वभाव होते। इस सिद्धांत के अनुसार, आत्मा के अलावा वास्तव में कुछ भी मौजूद नहीं है, और अगर हम आत्मा के अलावा किसी चीज का अनुभव करते हैं, तो वह भ्रम होगा। इसलिए, चूँकि इस अवधारणा में सुख और दुख का वास्तविक अस्तित्व नहीं है, इसलिए खुद पर या दूसरों पर क्रोध क्यों किया जाए?
 
If the soul were the cause of happiness and misery, we would not be able to blame others, because then happiness and misery would be the nature of the soul. According to this view, nothing exists apart from the soul and if we were to experience anything other than the soul, it would be attachment. So why should anyone get angry at himself or others, because according to this view, happiness and misery do not really exist.
तात्पर्य
चूँकि एक मृत शरीर को सुख या तकलीफ़ नहीं होती है, इसलिए हमारा सुख और दुख हमारी अपनी चेतना के कारण है, जो आत्मा का स्वरूप है। हालाँकि, आत्मा का मूल कार्य भौतिक सुख का आनंद लेना और भौतिक संकट सहना नहीं है। ये अज्ञान भौतिक स्नेह और झूठे अहंकार पर आधारित शत्रुता द्वारा उत्पन्न होते हैं। तृष्णा में हमारी भागीदारी हमारी चेतना को भौतिक शरीर में ले जाती है, जहाँ वह अपरिहार्य शारीरिक पीड़ा और समस्याओं से धक्का खाती है।

आध्यात्मिक स्तर पर न तो भौतिक सुख है और न ही संकट क्योंकि वहाँ जीवित चेतना पूरी तरह से लिप्त है, व्यक्तिगत इच्छा के बिना, परम प्रभु की भक्ति सेवा में। यह सुख की वास्तविक स्थिति है, जो झूठी शारीरिक पहचान से अलग है। दूसरों के साथ अपनी मूर्खता के लिए व्यर्थ में क्रोधित होने के बजाय, व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार करना चाहिए और जीवन की समस्याओं का समाधान करना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)