यदि आप यह कहते हैं कि शारीरिक इन्द्रियों पर शासन करने वाले देवता दुख देने वाले हैं, तब भी यह दुख आत्मा को कैसे हो सकता है? यह कर्म करना और उनके द्वारा प्रभावित होना मात्र परिवर्तनशील इन्द्रियों और उनके अधिष्ठाता देवताओं के बीच की अन्योन्य क्रिया है। यदि शरीर का कोई अंग दूसरे अंग पर हमला करता है, तो उस शरीर का धारक किस पर क्रोध कर सकता है?
Even if you say that the presiding deities of the bodily senses are the givers of suffering, how can such suffering apply to the soul? Doing this work and being affected by it is merely the interaction of the changing senses and their presiding deities. If one part of the body attacks another part, then on whom should the person having that body get angry?
तात्पर्य
ब्राह्मण आत्मसाक्षात्कार की स्थिति की विस्तार से व्याख्या कर रहा है, जिसमें व्यक्ति अपने आप को भौतिक शरीर और मन और उन्हें नियंत्रित करने वाले देवताओं से पूरी तरह अलग समझता है। शारीरिक सुख की खेती करके हम शारीरिक कष्ट को स्वीकार करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मूर्ख वातानुकूलित आत्माएं संकट को दूर करने और खुशी का आनंद लेने का प्रयास करती हैं, लेकिन भौतिक सुख और संकट एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शरीर के रूप में अपनी पहचान के बिना कोई भी शारीरिक सुख का आनंद नहीं ले सकता। लेकिन जैसे ही ऐसी पहचान होती है, व्यक्ति असंख्य पीड़ाओं और कष्टों से भी परेशान हो जाता है जो उसी शरीर में अनिवार्य रूप से मौजूद होते हैं। शारीरिक सुख और संकट देवताओं द्वारा प्रशासित होते हैं, जिन्हें कभी भी हमारे नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता; इस प्रकार व्यक्ति भौतिक मंच पर प्रोविडेंस की इच्छा के अधीन रहता है। यदि, तथापि, कोई भगवान के व्यक्तित्व, भगवान कृष्ण के सामने आत्मसमर्पण करता है, जो सभी आनंदों का भंडार है, तो वह आध्यात्मिक मंच तक पहुंच सकता है, जहां अलौकिक आनंद मुक्त आत्माओं को बिना किसी चिंता या दुख के जीवंत करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥