श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  11.23.5 
केनचिद् भिक्षुणा गीतं परिभूतेन दुर्जनै: ।
स्मरता धृतियुक्तेन विपाकं निजकर्मणाम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
एक बार की बात है, एक संन्यासी को दुष्ट लोगों ने तरह-तरह से अपमानित किया। लेकिन उसने धैर्यपूर्वक यह याद रखा की वो अपने ही पिछले कर्मों के फल भुगत रहा है। मैं तुम्हें उसकी कहानी और उसने जो कहा था वो सुनाऊंगा।
 
Once a Sanyasi was insulted in many ways by the wicked. But he patiently remembered that he was suffering the consequences of his own past deeds. I will tell you this story and what he said.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इस प्रकार टिप्पणी करते हैं “अक्सर वे जो भौतिकवादी मार्ग को त्याग देते हैं और खुद को त्याग के लिए समर्पित कर देते हैं वे अधर्मी लोगों द्वारा आक्रमण किए जाते हैं। यह विश्लेषण, अभी भी सतही है, क्योंकि दंड वास्तव में किसी के अतीत कर्म का संचित परिणाम है। कुछ त्यागी अपने पिछले पापों के अवशेषों के साथ प्रस्तुत किए जाने पर असहिष्णुता दिखाते हैं और इस प्रकार उन्हें फिर से अधर्मी जीवन के मार्ग पर प्रवेश करने के लिए मजबूर किया जाता है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु निर्देश देते हैं कि व्यक्ति को पेड़ की तरह सहनशील होना चाहिए। यदि भगवान के शुद्ध भक्तों की भक्ति सेवा के मार्ग पर एक नवोदित व्यक्ति को ईर्ष्यालु व्यक्तियों द्वारा हमला किया जाता है, तो उसे इसे अपनी पिछली फलदायी गतिविधियों के परिणाम के रूप में लेना चाहिए। एक व्यक्ति बुद्धिमान होना चाहिए और आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत के नैतिकता को अस्वीकार करके भविष्य में होने वाले दुख से बचना चाहिए। यदि कोई ईर्ष्यालु लोगों के साथ दुश्मनी में प्रवेश करने से इनकार करता है, तो वे उसे स्वतः ही अकेला छोड़ देंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)