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bhagavat 11.23.49: जो लोग इस शरीर को अपने अस्तित्व का आधार मानते हैं, जो केवल भौतिक मन का एक उत्पाद है, उनकी बुद्धि अंधी हो जाती है और वे "मैं" और "मेरा" की भावना से सोचने लगते हैं। इस भ्रम के कारण कि "यह मैं हूँ, लेकिन वह कोई और है", वे अंतहीन अंधकार में भटकते रहते हैं।   |   bhagavat अध्याय 11.23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  11.23.49 
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा
ममाहमित्यन्धधियो मनुष्या: ।
एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण
दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग इस शरीर को अपने अस्तित्व का आधार मानते हैं, जो केवल भौतिक मन का एक उत्पाद है, उनकी बुद्धि अंधी हो जाती है और वे "मैं" और "मेरा" की भावना से सोचने लगते हैं। इस भ्रम के कारण कि "यह मैं हूँ, लेकिन वह कोई और है", वे अंतहीन अंधकार में भटकते रहते हैं।
 
Those who identify themselves with this body, which is a product of the material mind, lose their intelligence and think in terms of “I” and “mine.” Because of their delusion that “This is me but that is someone else,” they wander in eternal darkness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)