श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  11.23.48 
तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेग-
मरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् ।
कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यै-
र्मित्राण्युदासीनरिपून् विमूढा: ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
इस दुर्दमनीय शत्रु रूपी मन, जिसके आवेग असहनीय हैं और जो हृदय को परेशान करता है, पर विजय न पा पाने के कारण कई लोग पूरी तरह से भ्रमित हो जाते हैं और दूसरों से व्यर्थ के झगड़े शुरू कर देते हैं। इस तरह वे इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि अन्य लोग या तो उनके मित्र हैं या उनके दुश्मन हैं या फिर उनके प्रति उदासीन हैं।
 
Many people, unable to conquer this invincible enemy of the mind, whose rage is unbearable and which torments the heart, become completely bewildered and start fighting with others for no reason. Thus they conclude that others are either their friends or their enemies or are indifferent to them.
तात्पर्य
पदार्थ शरीर के रूप में स्वयं की गलत पहचान, और बच्चों और पोते-पोतियों जैसे शारीरिक विस्तार को अपनी अनन्त संपत्ति समझना, यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक प्राणी ईश्वर के साथ गुणात्मक रूप से एक है। एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति में कोई आवश्यक अंतर नहीं है, क्योंकि सभी परमेश्वर का अनन्त विस्तार हैं। झूठे अहं में डूबा हुआ दिमाग भौतिक शरीर बनाता है, और शरीर के साथ पहचान करके, वातानुकूलित आत्मा झूठे अभिमान और अज्ञानता से अभिभूत हो जाती है, जैसा कि यहां वर्णित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)