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bhagavat 11.23.42: ब्राह्मण बोला: न तो ये लोग मेरे सुख और दुःख के कारण हैं, न देवता, मेरा शरीर, ग्रह, मेरे पिछले कर्म या समय ही। बल्कि, यह अकेला मन है जो सुख और दुःख का कारण है और भौतिक जीवन का चक्र चलाता रहता है।   |   bhagavat अध्याय 11.23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  11.23.42 
द्विज उवाच
नायं जनो मे सुखदु:खहेतु-
र्न देवतात्मा ग्रहकर्मकाला: ।
मन: परं कारणमामनन्ति
संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला: न तो ये लोग मेरे सुख और दुःख के कारण हैं, न देवता, मेरा शरीर, ग्रह, मेरे पिछले कर्म या समय ही। बल्कि, यह अकेला मन है जो सुख और दुःख का कारण है और भौतिक जीवन का चक्र चलाता रहता है।
 
The Brahmin said: Neither these people nor the gods, my body, the planets, my past deeds or time are the cause of my happiness and misery. Rather, it is the mind alone which is the cause of happiness and misery and which keeps on revolving in the material life.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)