धृत्या यया धारयते
मनः प्राणेंद्रिय क्रियाः
योगेनाव्यभिचारिण्या
धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी
"हे पृथा के पुत्र ! वह निश्चय जो अविचलित है, जो योगाभ्यास द्वारा अडिगता से धारण किया जाता है और इस प्रकार मन, प्राण तथा सभी इन्द्रियों के कार्यो को नियंत्रित करता है, वह सत्वगुण में स्थित होता है।"
नास्तिक जो परमेश्वर के भक्तो से ईर्ष्या रखते हैं, उन्हें नराधम या मनुष्यों में सबसे नीच कहा जाता है, और निश्चित रूप से वे नरक गामी होते हैं। वे भगवान की भक्ति में विघ्न डालने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, कभी सीधे प्रहार करके तो कभी उपहास करके। हालाँकि भक्त सहिष्णु बने रहते हैं, सत्वगुण में अपना निश्चय दृढ़ करते हैं। जैसा कि श्रील रूप गोस्वामी ने श्री उपदेशामृत (1) में वर्णन किया है:
वाचो वेगं मनसः क्रोध-वेगं
जिह्वा-वेगं उदरोपस्थ-वेगं
एतान वेगान यो विषहेत धीर:
सर्वाम अपीमां पृथ्वीं स शिष्यात्
"एक विचारशील व्यक्ति जो बोलने की इच्छा, मन की मांगों, क्रोध की क्रियाओं और जिह्वा, पेट और जननांगों की इच्छाओं को सहन कर सकता है, वह पूरे विश्व में शिष्य बनाने के लिए योग्य है।"
