एवं स भौतिकं दु:खं दैविकं दैहिकं च यत् ।
भोक्तव्यमात्मनो दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत ॥ ४० ॥
अनुवाद
उस ब्राह्मण को समझ में आ गया कि उसकी सारी तकलीफ़ें — अन्य जीवों से, प्रकृति की ऊँची ताकतों से और अपने शरीर से ही — टाली नहीं जा सकती हैं क्योंकि इन्हें भाग्य ने ही निश्चित कर दिया है।
The brahmin realized that all his suffering—caused by other creatures, higher forces of nature, and his own body—was avoidable because it was determined by Providence.
तात्पर्य
अनेक क्रूर व्यक्तियों ने ब्राम्हण का उत्पीड़न किया और उसका स्वयं का शरीर उसे बुखार, भूख, प्यास, थकान आदि के कष्ट प्रदान कर रहा था। प्रकृति की उच्च शक्तियाँ वे हैं जो अत्यधिक गर्मी, सर्दी, वायु और वर्षा का कारण बनती हैं। ब्राह्मण ने यह समझा कि उसका दुख उसके भौतिक शरीर से उसकी झूठी अभिज्ञानता के कारण था, न कि उसके शरीर का बाहरी परिघटनाओं से संपर्क के कारण। अपनी बाहरी परिस्थिति को अनुकूल बनाने की कोशिश करने के बजाय, उसने अपनी कृष्ण चेतना को अनुकूल बनाने की कोशिश की और इस तरह अपने वास्तविक स्वरूप को नित्य आत्मा के रूप में समझा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥