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bhagavat 11.23.38-39: कुछ लोग उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा करते, 'देखो तो इस महान शक्ति संपन्न ऋषि को! यह हिमालय की तरह स्थिर है। यह मौन रहकर बगुले की तरह कठोर निश्चय से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता रहता है।' अन्य लोग उसके उपर अपशब्द और अपमानजनक बातें कहा करते थे। और कुछ लोग इस द्विज ब्राह्मण को जंजीर में बांधकर उसे पालतू पशु की भाँति कैद करके रखते।   |   bhagavat अध्याय 11.23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  11.23.38-39 
अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव ।
मौनेन साधयत्यर्थं बकवद् द‍ृढनिश्चय: ॥ ३८ ॥
इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च ।
तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम् ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
कुछ लोग उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा करते, 'देखो तो इस महान शक्ति संपन्न ऋषि को! यह हिमालय की तरह स्थिर है। यह मौन रहकर बगुले की तरह कठोर निश्चय से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता रहता है।' अन्य लोग उसके उपर अपशब्द और अपमानजनक बातें कहा करते थे। और कुछ लोग इस द्विज ब्राह्मण को जंजीर में बांधकर उसे पालतू पशु की भाँति कैद करके रखते।
 
Some people would make fun of him by saying, "Just look at this very powerful sage! He is as patient as the Himalayas. He is striving like a heron to achieve his goal by making a great resolve through his vow of silence." Others would release their apana vaayu on him and some would tie this Dwija Brahmin in chains and keep him captive like a pet animal.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)