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bhagavat 11.23.37: वे यह कह कर उसकी निंदा-तिरस्कार करते थे कि “यह तो ढोंगी और ठग है। इसने धर्म को धंधा बना लिया है और दरअसल यह अपनी सारी संपति गँवा चुका है और उसके घरवालों ने इसे निकाल दिया है।”   |   bhagavat अध्याय 11.23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  11.23.37 
क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वज: शठ: ।
क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत् स्वजनोज्झित: ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
वे यह कह कर उसकी निंदा-तिरस्कार करते थे कि “यह तो ढोंगी और ठग है। इसने धर्म को धंधा बना लिया है और दरअसल यह अपनी सारी संपति गँवा चुका है और उसके घरवालों ने इसे निकाल दिया है।”
 
They criticize and insult him saying, “This man is a hypocrite and a fraud. This man is practicing religion because he has lost all his wealth and his family has thrown him out.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)