स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिल: ।
भिक्षार्थं नगरग्रामानसङ्गोऽलक्षितोऽविशत् ॥ ३२ ॥
अनुवाद
वह अपनी बुद्धि, इन्द्रियों और प्राण-वायु पर काबू रखकर पृथ्वी पर घूमने लगा। भिक्षा माँगने के लिए वह अकेले ही विभिन्न शहरों और गाँवों में जाता। उसने अपनी आध्यात्मिक उन्नति का प्रचार नहीं किया, इसलिए अन्य लोग उसे नहीं पहचान पाते थे।
He started wandering on the earth, keeping his intellect, senses and breath under his control. He would travel alone to various cities and villages to beg for alms. He did not publicize his high spiritual position, so others could not recognize him.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के अनुसार, त्रिदंडी-संन्यास जीवन क्रम को स्वीकार करना इस बात का प्रमुख संकेत है कि कोई फिलहाल भगवान के सुप्रीम पर्सनैलिटी की शरण में है। वैष्णव संन्यासियों के डंडे या कर्मचारियों के तीन दंड शरीर, मन और वचनों पर नियंत्रण का संकेत देते हैं जो केवल प्रभु की प्रेममय सेवा में ही संलग्न हैं। यह प्रक्रिया एक पेड़ से अधिक सहिष्णु बनने में मदद करती है, जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिफारिश की है। स्वयं के शरीर, मन व वाणी के सख्त नियंत्रण से, सहिष्णुता की गुणवत्ता मजबूत हो जाती है, और इस प्रकार व्यक्ति दूसरों को माफ करने, अपना समय बर्बाद न करने, इंद्रियों द्वारा तृप्ति से अलग रहने, किसी के काम पर झूठे घमंड से रहित रहने और मुक्ति की लालसा न करने के आगे के गुण प्रदर्शित करता है। इस तरह से व्यक्ति भौतिकवादी लोगों की मानसिकता को त्याग देता है, जो एक दूसरे का आपसी चापलूसी का तथाकथित स्नेही संबंध स्थापित करते हैं और एक दूसरे का इंद्रिय तुष्टि के लिए शोषण करते हैं। जो व्यक्ति कृष्ण भावना के सख्त मार्ग को अपनाता है, महान आत्माओं के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, व्यक्ति प्रभु की शरण को प्राप्त कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥