श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  11.23.22 
लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद्द्विजाग्र्‍यताम् ।
तदनाद‍ृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
परमात्मा द्वारा भी पूजे जाने वाले मानव जीवन को पाने वाले और उस मानव जन्म में सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण पद को प्राप्त करने वाले परम भाग्यशाली होते हैं। यदि वे इस महत्त्वपूर्ण अवसर को अनदेखा कर देते हैं, तो वे निश्चित रूप से अपने स्वयं के हितों की हत्या करते हैं और इस प्रकार अत्यंत दुखद अंत को प्राप्त होते हैं।
 
Those who obtain human life, which is desired even by the gods, and attain the highest brahminical position in that human birth, are extremely fortunate. If they disrespect this important opportunity, they certainly destroy their own welfare and meet a very painful end.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इस प्रकार से टिप्पणी करते हैं। "देवताओं, प्रेतों, आत्माओं, जानवरों, पेड़ों, निर्जीव पत्थरों, आदि की तुलना में मानव जन्म श्रेष्ठ है, क्योंकि देवता केवल स्वर्गीय सुखों का आनंद लेते हैं, और जीवन के अन्य रूपों में अत्यधिक दुख होता है। केवल मानव जीवन में ही व्यक्ति जीवन में अपने परम लाभ पर गहराई से विचार करता है। इसलिए मानव जन्म देवताओं के जन्म से भी अधिक वांछनीय है।" मानव जीवन के भीतर उच्च श्रेणी के ब्राह्मण का स्थान निश्चित रूप से सबसे अधिक वांछनीय है। हालाँकि, यदि कोई ब्राह्मण भगवान की भक्ति सेवा को त्याग देता है और अपने समुदाय की प्रतिष्ठा के लिए एक शूद्र की तरह कड़ी मेहनत करता है, तो वह निश्चित रूप से भौतिक इंद्रिय संतुष्टि के स्तर पर है। ब्राह्मणों की विशेष योग्यता आध्यात्मिक ज्ञान है जिसके द्वारा वे प्रत्येक जीवित व्यक्ति को भगवान का एक शाश्वत सेवक समझते हैं। एक ब्राह्मण, झूठे अहंकार से मुक्त, इस प्रकार खुद को घास के ब्लेड से नीचा समझता है और सभी जीवित प्राणियों का सहिष्णुतापूर्वक सम्मान करता है। सभी मनुष्य, और विशेष रूप से ब्राह्मणों को, कृष्ण चेतना, भगवान की प्रेममयी सेवा की उपेक्षा करके अपने स्वार्थ के हत्यारे बनने से बचना चाहिए। इस तरह की उपेक्षा भविष्य के दुख का मार्ग प्रशस्त करती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)