श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  11.23.2 
श्रीभगवानुवाच
बार्हस्पत्य स नास्त्यत्र साधुर्वै दुर्जनेरितै: ।
दुरक्तैर्भिन्नमात्मानं य: समाधातुमीश्वर: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण बोले : हे बृहस्पति के शिष्य, इस संसार में कोई भी साधु ऐसा नहीं है जो असभ्य लोगों के अपमानजनक शब्दों से विचलित हुए अपने मन को दोबारा स्थिर कर सके।
 
Sri Krishna said: O disciple of Brihaspati, there is no saintly person in this world who can again stabilize his mind after it is disturbed by the insulting words of uncivilized people.
तात्पर्य
आधुनिक युग में व्यापक रूप से आध्यात्मिक साक्षात्कार के मार्ग का उपहास उड़ाने वाला प्रचार होता है, और इस प्रकार संत-भक्त भी मानव समाज की प्रगति में बाधा देखकर परेशान होते हैं। फिर भी, भगवान के भक्त को किसी भी व्यक्तिगत अपमान को सहन करना चाहिए, हालाँकि वह खुद भगवान या भगवान के शुद्ध भक्त के अपराध को बर्दाश्त नहीं कर सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)