श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  11.23.13 
तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विन: ।
खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेद: सुमहानभूत् ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
सारी सम्पत्ति खो देने से उसे बहुत तकलीफ़ और ग़म हुआ। उसका गला रुंध गया और वह बहुत देर तक अपनी किस्मत के बारे में सोचता रहा। तभी त्याग की भावना उसके मन में कूट-कूट कर भर गई।
 
He felt great pain and sorrow on losing all his wealth. His throat was choked with tears and he kept thinking about his wealth for a long time. Then a strong feeling of renunciation arose in his mind.
तात्पर्य
इस ब्राह्मण को पहले पवित्र जीवन का प्रशिक्षण मिला था, लेकिन उसके अहंकारी व्यवहार ने उसकी पिछली नेकी को ढँक दिया था। अंत में, उसकी पिछली पवित्रता उसके अंदर पुनर्जागृत हुई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)