श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  11.23.10 
तदवध्यानविस्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद ।
अर्थोऽप्यगच्छन्निधनं बह्वायासपरिश्रम: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
हे दयालु उद्धव, इन देवताओं की उपेक्षा करने के कारण, उसके पुण्य के भंडार और सारी संपत्ति समाप्त हो गई। उसके निरंतर किए गए कठिन प्रयासों से जमा किया गया धन पूरी तरह से नष्ट हो गया।
 
O valiant Uddhava, by neglecting these demigods, his store of merits and all his wealth became empty. The store accumulated by his repeated and tireless efforts was completely exhausted.
तात्पर्य
ब्राह्मण की पवित्रता का भण्डार उस सूखी शाखा की तरह हो गया जो अब फल और फूल नहीं देती। श्रील जीवा गोस्वामी टिप्पणी करते हैं कि ब्राह्मण के पास मुक्ति प्राप्त करने की आशाओं के साथ परम भगवान के प्रति निष्ठा का एक निशान था। उसकी पवित्रता की शाखा का वह शुद्ध भाग अमिट बना रहा, अंततः ज्ञान का फल दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)