हे विश्वात्मा, इस संसार में मनुष्य का भौतिक जीवन में बंधन बहुत मजबूत होता है। इसलिए, अज्ञानी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराधों और गलतियों को सहना, यहां तक कि बड़े बड़े विद्वानों के लिए भी बहुत कठिन होता है। केवल आपके वे भक्त ही ऐसे अपराधों और गलतियों को सह पाते हैं, जो आपकी प्रेममयी भक्ति में लीन रहते हैं और जिनको आपके चरण कमलों में रहते हुए शांति मिल चुकी है।
O Universal Soul, man's bondage to material life is very strong; therefore, it is very difficult even for the learned to tolerate the offenses committed by ignorant men. Only Your devotees, who are devoted to Your loving devotion and who have attained peace by staying at Your lotus feet, are able to tolerate such offenses.
तात्पर्य
जब तक कोई सर्वोच्च प्रभु के यश को सुनने और जप करने की प्रक्रिया में उन्नत नहीं हो जाता है, तब तक सैद्धांतिक शिक्षा किसी को भी वास्तव में संत नहीं बना सकती है। किसी का वातानुकूलित व्यक्तित्व, दीर्घकालिक भौतिक संगति का परिणाम, दूर करना बहुत मुश्किल है। इसलिए, हमें विनम्रता से सर्वोच्च प्रभु के चरण कमलों का सहारा लेना चाहिए, जिन्होंने श्री उद्धव को ज्ञान के वास्तविक अर्थ को इतने शानदार ढंग से समझाया है।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत बाईसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥