मेरी शक्तियों के पारस्परिक प्रभाव से भिन्न-भिन्न मत उत्पन्न होते हैं। परन्तु जिन लोगों ने अपनी बुद्धि मुझ पर केन्द्रित कर ली है और अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया है, उनके विभिन्न मत दूर हो जाते हैं और इस प्रकार तर्क-वितर्क का मुख्य कारण ही मिट जाता है।
Different opinions (Vaada) arise from the interaction of My energies. But for those who have fixed their mind on Me and have subdued their senses, their differences disappear and the very cause of argument (disputation) vanishes.
तात्पर्य
भगवान की भौतिक ऊर्जाओं की परस्पर क्रिया के द्वारा अनुभूति की परस्पर विरोधी विविधताएँ अलग-अलग दार्शनिकों के मन में निर्माण होती हैं, जो अपनी राय का अटल रूप से बचाव करते हुए कहते हैं, "हो सकता है कि यह मामला हो या फिर वह या अन्य; या हो सकता है कि यह मामला न हो, या फिर हो सकता है कि मामला वह न हो।" ऐसे तार्किक या तर्कसंगत प्रस्ताव, संदेह, प्रस्तावों का विरोध, प्रतिक्रिया आदि हजारों विभिन्न रूपों में होते हैं और तर्क का आधार बन जाते हैं। वास्तव में, परम प्रभु व्यक्तित्व भगवान कृष्ण ही सभी अस्तित्व का आधार हैं, क्योंकि सब कुछ भगवान से ही निकलता है, भगवान द्वारा ही पोषित किया जाता है और अंत में भगवान में ही विलीन होकर शांत हो जाता है। भगवान कृष्ण परमतत्व हैं, जो सभी अन्य आश्रित सत्यों की अंतर्निहित सर्वोच्च सच्चाई हैं। उन विद्वान व्यक्तियों के समाज में जिन्होंने भगवान के व्यक्तित्व को सब कुछ समझ लिया है, दार्शनिक झगड़े का कोई और कारण नहीं रह जाता है। राय की ऐसी एकता दार्शनिक जिज्ञासा की अनुपस्थिति पर आधारित नहीं है, और न ही तर्कसंगत चर्चा के दमन पर है, अपितु आध्यात्मिक ज्ञान का स्वाभाविक परिणाम है। तथाकथित दार्शनिक गर्व से दावा करते हैं कि वे परम सत्य की खोज और अनुसंधान कर रहे हैं, फिर भी वे किसी तरह से उस व्यक्ति को जो परम सत्य को पा चुका है, उस व्यक्ति से कम बुद्धिमान मानते हैं जिसने इसे नहीं पाया है परंतु खोज रहा है। क्योंकि भगवान कृष्ण ही परम सत्य हैं, इसलिए जो व्यक्ति पूर्ण रूप से भगवान के प्रति समर्पण कर देता है वह सबसे अधिक विद्वान व्यक्ति बन जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥