श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  11.22.58-59 
क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भ‍ि: प्रलब्धोऽसूयितोऽथवा ।
ताडित: सन्निरुद्धो वा वृत्त्या वा परिहापित: ॥ ५८ ॥
निष्ठ्युतो मूत्रितो वाज्ञैर्बहुधैवं प्रकम्पित: ।
श्रेयस्काम: कृच्छ्रगत आत्मनात्मानमुद्धरेत् ॥ ५९ ॥
 
 
अनुवाद
जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य का आकांक्षी व्यक्ति, बुरे लोगों द्वारा उपेक्षित किए जाने, अपमानित किए जाने, उपहास किए जाने या ईर्ष्या किए जाने पर अथवा मूर्ख लोगों द्वारा बार-बार मारे-पीटे जाने, बांधे जाने या आजीविका छीन लिए जाने, अपने ऊपर थूके जाने या पेशाब फेंके जाने के बावजूद भी अपनी बुद्धि का प्रयोग कर अपने को आध्यात्मिक ऊंचाई पर बनाए रखे।
 
A person who wants to attain the highest goal of life must use his intelligence to keep himself secure in the spiritual position despite difficulties such as being ignored, insulted, ridiculed or envied by bad people, or being repeatedly beaten, tied up or having his livelihood taken away, spit upon or urinated upon by ignorant persons.
तात्पर्य
पूरे इतिहास में भगवान के भक्तों को उपर्युक्त असुविधाओं का अक्सर अनुभव करना पड़ा है। जो व्यक्ति भगवान की चेतना में आगे बढ़ गया है, वह ऐसी परिस्थितियों में भी अपने आप को भौतिक शरीर के मोह में नहीं फँसाता है, बल्कि उचित बुद्धि के द्वारा मन को आध्यात्मिक स्तर पर स्थिर रखता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)