अतः हे उद्धव, भौतिक इंद्रियों से विषय-भोग कर आनंद प्राप्त करने का प्रयत्न मत करो। देखो कि भौतिक द्वंद्व पर आधारित भ्रम किस प्रकार व्यक्ति को स्वयं को जानने से रोकता है।
Therefore, O Uddhava, do not try to enjoy sense gratification through the material senses. See how the delusion based on material duality prevents one from realizing the Self.
तात्पर्य
जो भी मौजूद है वह सर्वोच्च प्रभु की क्षमता और संपत्ति है, जिसका उपयोग उनकी प्रेमपूर्ण सेवा में करना है। भौतिक वस्तुओं को प्रभु से अलग देखना और इस प्रकार उनका स्वामित्व पाने और उनका आनंद लेने का मतलब वैकल्पिक भ्रम, भौतिक द्वंद्व का भ्रम है। भोग की व्यक्तिगत वस्तु का चयन करते समय, जैसे भोजन, वस्त्र, निवास या वाहन, व्यक्ति अधिग्रहित की जाने वाली वस्तु की सापेक्ष गुणवत्ता पर विचार करता है। नतीजतन, भौतिक जीवन में व्यक्ति निरंतर चिंता में रहता है, अपने व्यक्तिगत सुख के लिए सबसे उत्कृष्ट इंद्रिय संतुष्टि प्राप्त करने की कोशिश करता है। यदि व्यक्ति सब कुछ को प्रभु की संपत्ति के रूप में महसूस करता है, तो वह सब कुछ प्रभु के सुख के लिए समझेगा। वह कोई व्यक्तिगत चिंता महसूस नहीं करेगा, क्योंकि वह केवल प्रभु की प्रेमपूर्ण सेवा में संलग्न होने से संतुष्ट है। प्रभु की संपत्ति का दोहन करना और साथ ही आत्म-साक्षात्कार में आगे बढ़ना संभव नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥