श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  11.22.56 
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
कामवासना में लिप्त रहने वाला व्यक्ति भौतिक जीवन को वास्तविक न होते हुए भी नहीं त्याग सकता, ठीक वैसे ही जैसे सपने में आने वाले अप्रिय अनुभव दूर नहीं जा पाते।
 
For a person who focuses his attention on sense-gratification, physical life, though not real, cannot be removed just as unpleasant experiences in dreams cannot be removed.
तात्पर्य
कोई यह आपत्ति कर सकता है कि यदि भगवान कृष्ण इस बात पर जोर देते हैं कि भौतिक जीवन झूठा है, तो फिर कोई इसे रोकने का प्रयास क्यों करे? इसलिए प्रभु यहाँ समझाते हैं कि भले ही यह तथ्यात्मक नहीं है, लेकिन भौतिक जीवन हठपूर्वक उस व्यक्ति के लिए जारी रहता है जो इंद्रिय सुख का आदी है, जैसे एक भयावह सपना एक व्यक्ति के सोते रहने के लिए जारी रहता है। "अविद्यमान" शब्द, "अस्तित्वहीन", का अर्थ है कि भौतिक जीवन मानसिक अवधारणा पर आधारित है, जिसमें एक व्यक्ति सोचता है, "मैं एक आदमी हूँ," "मैं एक महिला हूँ," "मैं एक डॉक्टर हूँ," "मैं एक सीनेटर हूँ," "मैं एक सड़क साफ़ करने वाला हूँ" और इसी तरह। एक वातानुकूलित आत्मा उत्साहपूर्वक शरीर के साथ काल्पनिक पहचान के आधार पर अपनी गतिविधियाँ करती है। इस प्रकार यद्यपि आत्मा मौजूद है और शरीर मौजूद है, शरीर के साथ झूठी पहचान मौजूद नहीं है। भौतिक जीवन, एक झूठे विचार पर आधारित है, जिसका कोई तथ्यात्मक अस्तित्व नहीं है।

सपने से जागने के बाद, सपने का मद्धिम प्रतिबिंब व्यक्ति की स्मृति में रह सकता है। इसी तरह, प्रभु की भक्ति सेवा में संलग्न व्यक्ति कभी-कभी पापपूर्ण जीवन के मद्धिम प्रतिबिंब से परेशान हो सकता है। इसलिए व्यक्ति को श्री उद्धव को प्रभु के निर्देशों को सुनकर कृष्ण चेतना में मजबूत होना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)