जब पानी में हलचल होती है, तब पेड़ हिलते हुए दिखाई देते हैं और इसी तरह, जब कोई चलती नाव पर बैठा हो, तो उसे किनारे के पेड़ हिलते हुए दिखाई देते हैं। जब हवा पानी को हिलाती है, लहरें पैदा करती है, पानी में अपने आप ही गति दिखाई देती है, हालाँकि यह वास्तव में हवा की वजह से हिल रहा होता है। भौतिक जीवन में आसक्त आत्मा कोई भी कर्म नहीं करती, बल्कि यह भौतिक शरीर होता है, जो भ्रमित जीवित इकाई की सहमति से, प्रकृति के गुणों द्वारा चलाया जाता है। अपने ऊपर इस वाह्य गति को थोपता है, खुद को नाचते हुए, गाते हुए, दौड़ते हुए, मरते हुए, जीतते हुए वगैरह मानता है, हालाँकि ये मात्र बाहरी शरीर और प्रकृति के गुणों के बीच परस्पर क्रियाएँ हैं।
