श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  11.22.54-55 
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन द‍ृश्यते भ्रमतीव भू: ॥ ५४ ॥
यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा ।
स्वप्नद‍ृष्टाश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मन: ॥ ५५ ॥
 
 
अनुवाद
हे दशार्ह वंशज, यह भौतिक जीवन जगत जो तुम अनुभव कर रहे हो, इंद्रियों के सुखों का भोग करते हो, वह वास्तव में झूठा है, ठीक उसी प्रकार जैसे कि जल में परछाई के रूप में दिखने वाले वृक्ष हिलते-डुलते दिखते हैं, या जैसे कि अपनी आंखों को चारों ओर घुमाने से पृथ्वी घूमती हुई दिखती है, या जैसे कि स्वप्न या कल्पना का संसार होता है।
 
O descendant of Dasharha, the material life of the soul, its experience of sense-gratification, is as false as the movement of trees reflected in troubled water, or the rotation of the earth caused by moving the eyes around, or the world of imagination or dreams.
तात्पर्य

जब पानी में हलचल होती है, तब पेड़ हिलते हुए दिखाई देते हैं और इसी तरह, जब कोई चलती नाव पर बैठा हो, तो उसे किनारे के पेड़ हिलते हुए दिखाई देते हैं। जब हवा पानी को हिलाती है, लहरें पैदा करती है, पानी में अपने आप ही गति दिखाई देती है, हालाँकि यह वास्तव में हवा की वजह से हिल रहा होता है। भौतिक जीवन में आसक्त आत्मा कोई भी कर्म नहीं करती, बल्कि यह भौतिक शरीर होता है, जो भ्रमित जीवित इकाई की सहमति से, प्रकृति के गुणों द्वारा चलाया जाता है। अपने ऊपर इस वाह्य गति को थोपता है, खुद को नाचते हुए, गाते हुए, दौड़ते हुए, मरते हुए, जीतते हुए वगैरह मानता है, हालाँकि ये मात्र बाहरी शरीर और प्रकृति के गुणों के बीच परस्पर क्रियाएँ हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)