श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  11.22.53 
नृत्यतो गायत: पश्यन् यथैवानुकरोति तान् ।
एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥ ५३ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे कोई व्यक्ति नाचते-गाते हुए लोगों को देखकर उनका अनुकरण करता है, वैसे ही आत्मा भौतिक बुद्धि द्वारा अभिभूत होकर भौतिक गुणों का अनुकरण करती है, हालाँकि वह कभी भी भौतिक कृत्यों की कर्ता नहीं होती।
 
Just as a person sees dancing and singing persons and imitates them, so the soul, though not the doer of fruitive activities, is deluded by material intelligence and is forced to imitate its qualities.
तात्पर्य
कभी-कभी लोग पेशेवर गायकों और नर्तकों पर मोहित हो जाते हैं और अपने मन में कलाकारों की संगीतमय लय और धुनों की नकल करते हैं। साथ ही उनकी रोमांटिक, हास्यपूर्ण या वीर भावनाओं की भी। लोग रेडियो पर सुने गए गीत गाते हैं और टेलीविजन या फिल्मों और थिएटरों में देखे गए नृत्य और नाटकीय प्रदर्शनों की नकल करते हैं, कलाकार की भावनाओं और कला में प्रवेश करते हैं। इसी तरह, सशर्त आत्मा भौतिक मन और बुद्धि के काढ़े से मोहित हो जाती है, जो उसे समझाते हैं कि वह भौतिक संसार का आनंद लेने वाला बन सकता है। भले ही भौतिक शरीर से अलग और कभी भी उसकी गतिविधियों का वास्तविक कलाकार नहीं, सशर्त आत्मा को भौतिक गतिविधियों में अपने शरीर को व्यस्त रखने के लिए प्रेरित किया जाता है, जो उसे जन्म और मृत्यु के चक्र में उलझाता है। भौतिक बुद्धि के अवैध प्रस्तावों को स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि कृष्ण चेतना में पूर्ण रूप से प्रभु की सेवा में खुद को संलग्न करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)