श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  11.22.51 
प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्याबुध: पुमान् ।
तत्त्वेन स्पर्शसम्मूढ: संसारं प्रतिपद्यते ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
प्रकृति से स्वयं को अलग न कर पाने के कारण अज्ञानी व्यक्ति प्रकृति को वास्तविक मानता है। इसके संपर्क में आते ही वह पूरी तरह से भ्रमित हो जाता है और जन्म-मृत्यु के चक्र में फंस जाता है।
 
An ignorant person, unable to understand himself as separate from nature, considers nature to be the truth. By coming in contact with it, he becomes completely fascinated and enters the cycle of the world.
तात्पर्य
श्रीमद-भागवतम (१.७.५) में भी एक ऐसा ही श्लोक मिलता है:

याया सम्मोहितो जीव

आत्मानं त्रि-गुणात्मकम

परोऽपि मनुतऽनर्थं

तत्-कृतं चाभिपद्यते

“इस बाह्य ऊर्जा के कारण, जीव, यद्यपि भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से परे है, वह अपने बारे में भौतिक उत्पाद के रूप में सोचता है और इस प्रकार भौतिक कष्टों की प्रतिक्रियाओं को लेता है।”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)