श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  11.22.5 
नैतदेवं यथात्थ त्वं यदहं वच्मि तत्तथा ।
एवं विवदतां हेतुं शक्तयो मे दुरत्यया: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
जब दार्शनिक ये कहते हैं कि "मैं इस विशेष प्रसंग का उसी तरह से विश्लेषण करना नहीं चाहता जैसे तुम चाहते हो," तब मैं समझता हूँ कि मेरी अपनी प्रेरणाएँ ही उनकी विश्लेषणात्मक असहमति को जन्म दे रही हैं।
 
When philosophers argue, “I don’t want to interpret this particular passage the way you want to,” it is my inviolable powers that motivate their analytical disagreements.
तात्पर्य

सर्वोच्च पुरुष की भौतिक विभूतियों के कारण, सांसारिक दार्शनिक सदैव इस बात पर बहस करते रहते हैं कि पहले कौन आया, मुर्गी या अंडा। सत्व, रज और तमोगुण के प्रभाव से, विभिन्न दार्शनिक विभिन्न विचारों की ओर आकर्षित होते हैं; और प्रभु द्वारा निर्मित भौतिक वातावरण के प्रभाव से, ये दार्शनिक निरंतर एक-दूसरे से असहमत रहते हैं। हालाँकि, स्वयं सर्वोच्च प्रभु ने स्पष्ट व्याख्या दी है। जैसा कि श्रीमद-भागवतम् (6.4.31) में कहा गया है:

यच्चक्तयो वदतां वादिनां वै

विवाद-संवाद-भुवो भवन्ति

कुर्वन्ति कैषां मुहुर् आत्म-मोहं

तस्मै नमोऽनन्त-गुणाय भूम्ने

“मैं सर्वव्यापी सर्वोच्च पुरुषत्व को अपना सम्मानपूर्ण प्रणाम करता हूँ, जिसके पास असीम पारलौकिक गुण हैं। सभी दार्शनिकों के हृदय की गहराइयों से कार्य करते हुए, जो विभिन्न विचारों का प्रचार करते हैं, उसने उन्हें उनकी अपनी आत्माओं को भूलने के लिए प्रेरित किया, जबकि कभी सहमत होते थे और कभी आपस में असहमत होते थे। इस प्रकार वह इस भौतिक दुनिया के भीतर एक ऐसी स्थिति बनाता है जिसमें वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते हैं। मैं उसे अपना सम्मानजनक प्रणाम अर्पित करता हूँ।”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)