श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 22: भौतिक सृष्टि के तत्त्वों की गणना  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  11.22.49 
आत्मन: पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ ।
न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षण: ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
अपने पिता या दादा की मृत्यु से व्यक्ति अपनी मृत्यु का अंदाजा लगा सकता है और अपने पुत्र के जन्म से वह अपने जन्म की स्थिति को समझ सकता है। इस प्रकार जो व्यक्ति भौतिक शरीरों की सृष्टि और विनाश को यथार्थ रूप से समझता है, वह इन द्वंद्वों में नहीं पड़ता है।
 
From the death of his father or grandfather a man can predict his own death and from the birth of his son he can understand the state of his birth. Thus a person who truly understands the origin of physical bodies does not fall into these dualities.
तात्पर्य
भगवान ने भौतिक शरीर के नौ चरणों का वर्णन किया है, जो गर्भाधान, गर्भधारण और जन्म से शुरू होते हैं। कोई तर्क दे सकता है कि एक जीवधारी को माँ के गर्भ में अपनी मौजूदगी या अपने जन्म और शुरुआती बचपन को याद नहीं रख सकता है। इसलिए भगवान यहाँ कहते हैं कि कोई अपने बच्चे का अध्ययन करके शारीरिक अस्तित्व के इन चरणों का अनुभव कर सकता है। इसी तरह, हालाँकि कोई भी हमेशा के लिए जीने की आशा कर सकता है, अपने पिता, दादा या परदादा की मृत्यु का अनुभव करने पर, उसके पास निश्चित प्रमाण है कि भौतिक शरीर मर जाएगा। एक शांत व्यक्ति, आत्मा को शाश्वत जानकर, अस्थायी, अविश्वसनीय शरीर के साथ झूठी पहचान छोड़ देता है और भगवान की भक्ति सेवा का आश्रय लेता है। इस प्रक्रिया से जन्म और मृत्यु के कृत्रिम आरोपण से बचा जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)