मनुष्य वास्तव में पिछले कर्मों के बीज से जन्म नहीं लेता है, और न ही अमर होने के कारण मरता है। मोह के कारण जीव जन्म लेता हुआ और मरता हुआ प्रतीत होता है, जैसे लकड़ी के संयोग से आग जलती हुई प्रतीत होती है और फिर बुझ जाती है।
Man is neither born from the seed of his past deeds nor does he die because he is immortal. Due to attachment, a living being seems to be born and dies, just as fire seems to burn and then extinguish due to contact with wood.
तात्पर्य
अग्नि तत्व भौतिक सृष्टि में सदा ही वर्तमान रहता है, लेकिन किसी विशेष काष्ठ के संयोग से अग्नि प्रकट होती हुई और बुझती हुई प्रतीत होती है। उसी प्रकार जीवात्मा शाश्वत है, लेकिन किसी विशेष शरीर के संयोग से जन्म-मृत्यु का आभास होता है। कर्मों की प्रतिक्रियाएँ जीवात्मा पर अस्थायी सुख-दुःख को थोपती हैं, परन्तु वे स्वयं के शाश्वत स्वरूप को परिवर्तित नहीं करतीं। दूसरे शब्दों में, कर्म माया का एक चक्र है जिसमें एक मायावी क्रिया दूसरी को जन्म देती है। कृष्ण चेतना जीवन को प्रभु की प्रेममयी सेवा में आध्यात्मिक क्रियाओं में संलग्न करके कर्म चक्र को रोक देती है। такой कृष्ण चेतना से व्यक्ति फलदायी प्रतिक्रियाओं की मायावी श्रृंखला से मुक्त हो सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥