यद्यपि दीये का प्रकाश प्रकाश की असंख्य किरणों से मिलकर बना होता है और निरंतर बनता-मिटता रहता है, किन्तु जो व्यक्ति भ्रमवश मोहग्रस्त है और क्षण भर के लिए प्रकाश को देखता है, वह झूठ बोलता है और कहता है, "यह दीये का वही प्रकाश है।" यह स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसे नदी के बहते जल को देखकर कोई कहे, "यह नदी का वही जल है।" इसी तरह, यद्यपि मनुष्य का भौतिक शरीर निरंतर परिवर्तित हो रहा होता है, किन्तु जो लोग अपने जीवन को व्यर्थ गँवा रहे होते हैं, वे गलत तरीके से सोचते हैं और कहते हैं कि शरीर का प्रत्येक विशेष चरण व्यक्ति की वास्तविक पहचान है।
Although innumerable rays of light are created, transformed and decayed in the light of a lamp, when a person who is enamoured looks at this light for a moment, he will falsely say, “This is the same light of the lamp.” Just as looking at a single point of water in a flowing river which keeps flowing forward, one may falsely say, “This is the same water of the river.” In the same way, although the human body is constantly changing, those who waste their lives falsely think and say that each particular state of the body is the real identity of that person.
तात्पर्य
यद्यपि कोई कह सकता है, "यह दीपक का प्रकाश है", प्रत्येक क्षण असंख्य प्रकाश किरणें उत्पन्न होती हैं, रूपांतरित होती हैं और नष्ट होती हैं; और यद्यपि कोई नदी के पानी की बात कर सकता है, वहाँ पानी के विभिन्न अणुओं की एक सदैव-नई आपूर्ति होती रहती है। इसी प्रकार, जब कोई किसी छोटे बच्चे से मिलता है, तो वह शरीर के उस विशेष क्षणिक चरण को व्यक्ति की वास्तविक पहचान के रूप में स्वीकार करता है, उसे एक बच्चा मानता है। व्यक्ति एक बूढ़े शरीर को भी एक बूढ़ा व्यक्ति मानता है। हालाँकि, वास्तव में, मनुष्य का भौतिक शरीर, नदी की लहरों या दीपक के विकिरण की तरह, भौतिक प्रकृति के तीनों रूपों, भगवान के प्रभाव का मात्र एक रूपांतरण है। व्यक्ति की वास्तविक पहचान आध्यात्मिक आत्मा है, जो भगवान कृष्ण का अभिन्न अंग है, लेकिन जैसा कि इस पद में भगवान कृष्ण साबित करते हैं, एक बंधी हुई आत्मा समय की सूक्ष्म गतिविधियों को देखने या समझने में असमर्थ होती है। भौतिक चेतना की स्थूल दृष्टि से व्यक्ति भौतिक अभिव्यक्ति के सूक्ष्म खंडों का पता नहीं लगा सकता है, जो स्वयं भगवान द्वारा समय के रूप में प्रेरित होते हैं। इस पद में शब्द mṛṣāyuṣām उन लोगों को इंगित करता है जो प्रभु के निर्देशों को समझे बिना अज्ञानता में अपना समय व्यर्थ गँवा रहे हैं। ऐसे व्यक्ति भोलेपन से शरीर के किसी भी विशेष चरण को शरीर के भीतर आत्मा की वास्तविक पहचान मान लेते हैं। क्योंकि आत्मा भौतिक परिवर्तन के अधीन नहीं है, जब वह कृष्ण भावना के अनन्त विविध आनंद में संलग्न होता है, सर्वोच्च प्रभु के प्रति प्रेमपूर्ण सेवा, उसे आगे कोई अज्ञान या दुख का सामना नहीं करना पड़ेगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥