यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पते: ।
तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादय: कृता: ॥ ४४ ॥
अनुवाद
सभी भौतिक शरीरों के रूपांतरण की विभिन्न अवस्थाएँ दीपक की लौ, नदी की धारा या वृक्ष के फलों के परिवर्तन के समान ही बदलती रहती हैं।
The various states of transformation of all physical bodies keep changing just as the flame of a lamp, the flow of a river or the fruits of a tree keep changing.
तात्पर्य
मोमबत्ती की टिमटिमाती हुई लौ कभी तेज जलती है और कभी धीमी हो जाती है। अंततः यह समाप्त हो जाती है। बहती हुई नदी की लहरें उठती और गिरती हैं, जिससे अनगिनत आकार और पैटर्न बनते हैं। एक पेड़ के फल धीरे-धीरे जन्म लेते हैं, बढ़ते हैं, पकते हैं, मीठे होते हैं और अंततः सड़कर मर जाते हैं। इसी तरह, कोई आसानी से समझ सकता है कि स्वयं का शरीर निरंतर परिवर्तन से गुजर रहा है, और निश्चित रूप से वह शरीर वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु के अधीन है। जीवन के विभिन्न समयों पर शरीर में यौन क्षमता, शारीरिक शक्ति, इच्छा, ज्ञान आदि की डिग्री प्रदर्शित होती है। जैसे-जैसे शरीर बूढ़ा होता जाता है, शारीरिक शक्ति कम हो जाती है, लेकिन शरीर में इस तरह के परिवर्तन के बाद भी ज्ञान बढ़ सकता है। भौतिक जन्म और मृत्यु विभाजित समय के दायरे में होती है। किसी भौतिक वस्तु का जन्म, निर्माण या उत्पादन उसे तुरंत भौतिक दुनिया के भीतर सूक्ष्म समय के एक विभाजित अनुक्रम से जोड़ता है। इस प्रकार इसका विनाश या मृत्यु अपरिहार्य है। समय की अथक शक्ति इतनी सूक्ष्मता से चलती है कि केवल सबसे बुद्धिमान ही इसे समझ सकते हैं। जैसे-जैसे मोमबत्ती की लौ धीरे-धीरे कम होती जाती है, जैसे नदी के भीतर बहती हुई धाराएँ चलती हैं या जैसे पेड़ पर फल धीरे-धीरे पकते हैं, भौतिक शरीर लगातार अपरिहार्य मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। इसलिए अस्थायी शरीर को कभी भी शाश्वत, अपरिवर्तनीय आत्मा से भ्रमित नहीं होना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥